Friday, 28 June 2013

आज, औरत का वजूद..

क्या इस देश को बना दिया,
औरत को आज ये दिन दिखा दिया।
घर से निकल ने में वो डरती हैं,
अपनी हि परछाई से घबराती हैं।।

जिसकी कोक से जनम लेते हैं,
जिसके कांधे पर सर रख रोते हैं,
जिसकी गोद में हम सोते हैं,
और इसी औरत को मूठ्ठी में,
हम दबोचते हैं।।

जब ज़रूरत होती हैं,
तो उसके पास हम जाते हैं।
और उसी के पैरों में गिर जाते हैं।
कहाँ वो इंसानीयत चली गई,
कहाँ से ये दरिन्दगी आ गई।।
एक गली मोम्बत्ती जलाए,
औरत ईंसाफ मांग रही होती हैं।
वँही दूसरी गली पाँच साल की,
लड़की कि मासूमियत कुचल रही होती हैं।
क्या इस देश को बना दिया,
औरत को आज ये दिन दिखा दिया।
और हर माँ को,
ये कहने पर मजबूर कर दिया
“अगले जनम मोरे बिटिया ना किजौ..
मोरे बिटिया ना किजौ”।।


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